By- VARUN SINGH GAUTAM
कब थमेगा कोरोना का कहर
जग कर रही है हाहाकार
कहीं पर गाड़ रहें ढ़ेर भरी लाशें
कहीं हो रहीं दाह संस्कार
कोरोना के देवारि से
आखिरी साँसे गिनता भरोसा किसका
आँसू में भी औसत तलाश रहें लोग
गरीब को मरते तमाशा देख रहें लोग
मदद करने के बजाय भाग रहें लोग
बढ़ती जा रही मुर्दों का शहर
कहीं उपहास से तो कहीं साँसों से
ज़िन्दगी और मौत से तड़प रहें लोग
आखिर कब थमेगा कोरोना कहर !
यह कविता मँझधार पुस्तक से वरुण सिंह गौतम की स्वंयकृति है।
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