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PARTH SARTHI SHUKLA KI KAVITA

शीर्षक:- सम्भाल कर (पिता)
राह तेरी है कठिन बानो की सैया के समा
चाहता तुझको करना विचलित पथ से सर यह जमा
आएंगी उसे राह में विघ्ने आंख मूंद पार कर
संग मैं भी चलता हूं उंगली पकड़ संभाल कर
क्यों हृदय को थामे बैठा राह के तू मोड़ पे
तू अकेला रही मुझको राह में तू जोड़ ले
इस हृदय का शूल क्या है जानकर अनजान कर
संग मैं भी चलता हूं उंगली पकड़ संभाल कर
सिमटा हुआ तू बैठा है इस सुनसान राह में
सनसनी हवा चाले समिट जा आके बाहों में
बिन लड़े तू शांत सा यूं बैठा क्यों है हार कर
संग मैं भी चलता हूं उंगली पकड़ संभाल कर
राह का अंत है निकट रो लेन दे लगा के गले
वह पल होने को है खत्म जो साथ हम दोनों चले
यह आंसू पूछ हंस जरा चेहरे को तू सवार कर
साथ-साथ चल रहा उंगली पकड़ संभाल कर
हर कदम पर संग तेरे चल रहा था मैं अभी
ढूंढता है तू जिसे मंजिल है वो यही कहीं
जाकर जीत ले उसे यह मेरा साया त्याग कर
जीत कर तू लौटना चलना सदा संभाल कर ||
शीर्षक:- मंजिल
राह बताती कुछ दिशाओं
मंद सी पवन हवाओं
को लिए मैं संग मंजिल,
ओर बढ़ता जा रहा ।
इक अनंत तन लिए
अधर धारा सा मन लिए
ओ’ चक्षु में गरल लिए,
संघर्ष करता जा रहा ।
हिम गिरी के सर्व खंड
की शिखाएं जो प्रचंड
उन शिखाओं से लिए,
सन्देश चढ़ता जा रहा ।
तम – प्रकाश द्वंद्व में
त्रिकाल के संबंध में
नभ धारा के अंक में
अथक मैं लड़ता जा रहा ।
लेख मेरी जीत का वो
स्वर्ण अक्षर में लिखा
मैं सदा उस लेख का
कर गान पढ़ता जा रहा ।
शत्रु मेरे सामने, मैं
बाण साधे हूं खड़ा
रुक जरा ए मेरी मंजिल
तेरी ओर आ रहा ।
रुक जरा ए मेरी मंजिल
तेरी ओर आ रहा ।।
शीर्षक:- नाम आत्मा
करता जो तू, खुद पे गुमान
मुझ बिन तू बस, मुर्दा समान
सर्व शक्तिमान हूँ मैं महान्
हूँ तुझमे भी तू मुझको जान
जन-जन में पूर्ण समाता मैं
मृत्यु को कभी न पाता मै
तेरे सुख-दुःख का दाता मै
तुझे छोड कहीं न जाता मैं
यदि चला छोड़ के जाऊँ मैं
फिर लौट कभी न आऊँ मैं
तुझसा ही किसी को लाऊँ मैं
तब गया वो जीवन पाऊँ मै
जबा, कृष्ण ने भी यह ज्ञान बताया
पार्थ को मेरा मान बताया
मुझको ब्रह्म का वंश बताय
ईश्वर का मुझे अंश बताया
जीता तीनों काल में मैं
जीवन-मृत्यु के जाल में मैं
हूँ मैं धरती, पाताल में मैं
और समय की वो उस चाल में मैं
जल जाता जग, मैं जलूं नहीं
गल जाता जग, मैं गलूँ नहीं
अस्त्रों-शस्त्रों से कटू नहीं
मृत्यु में कभी मैं मरू नहीं
तेरे अन्दर की भक्ति मैं
तेरे अन्दर की शक्ति मै
हर एक जीव, हर पक्षी मैं
प्रेतों के रूप में भक्षी मैं
वो देव लोक का दूत भी में
मानव हूँ मैं. हूँ भूत भी मैं
मैं सर्व लोक में व्यापी हूं
मैं हरि नाम का जापी हूँ
क्यों तुझमें यूँ मैं समाया हूं
मैं कौन-कहाँ से आया हूं
न देव हूँ, न कोई साया हूं
मैं नाम आत्मा पाया हूं।
बस राम आत्मा पाया हूं।।
शीर्षक:- सारथी का प्रभात वर्णन
अवलोक होती रश्मियॉ
अरुण की, एक ओर से
झाँकता सा दिख रहा है,
इंदु दूजे छोर से।
हो रहा है भोर
या कि, टिमटिमाती रात है
रो रहा है कोई
या फिर मंद सी बरसात है
ले प्रभा का आसरा
हैं पर्ण गाते शोर से
झाँकता सा दिख रहा है,
इंदु दूजे छोर से।।
है खगों का शोर ये जो,
लग रहा है गीत सा
है स्वरों का स्वर्ण संगम
है मधुर अवनीत सा
अलि – मृणाली के मिलन की,
नाद उठती जोर से
झाँकता सा दिख रहा है,
इंदु दूजे छोर से।।
मेघ व्यापी हैं अचल में
जो गगन को चूमते
वाहिनी संग खेलते हैं,
वादियों में झूमते
दून-तरणी-नग-घटा
बंधे हो मानो डोर से,
झाँकता सा दिख रहा है,
इंदु दूजे छोर से।।
शीर्षक:- देखो स्वप्न
कुछ स्वप्नों को तुम देख देख
देते जो मन से फेक फेक
उस स्वप्न में तुमने जो देखा
आंखों में रखो सेंक सेंक
देखा उन वीर जवानों को
देखा ध्वज के अभिमानों को
ज्योतिषी शास्त्र विज्ञानों को
भारत के राज घरानों को
क्या देखा तुमने स्वप्न में अपने
वीरों के बलिदानों को
हां देखा होगा स्वप्न में तुमने
उन रक्तों के दानों को
न देखा हो तो देख लो जाके
बहनों के अरमानों को
हां देख लो जाकर सपनों में
मां-बाप की उन संतानों को
हां देखो जाकर तुम खूनों में
रंगी ही उन म्यानों को
और देख लो जाकर उन सभी
माटी स्वरूप शमशानों को
हां देखो जाके उन वीरों को
फांसी पर जो झूल गए
इस देश की माटी के खातिर
अपनों को तक तो भूल गए
यदि ना देखा तो स्वप्न वो देखो
कांपे रूह जिससे थर थर
और देखो स्वप्नों में जो कभी न
लौट सके अपने घर पर
क्यों न होके भी सैनिक मैं
यह बात बताने आया हूं
यह देश धर्म है सबका क्यों
वह धर्म जताने आया हूं
ज़रा याद करो इसकी महिमा
जिसकी गाथा जग गाता था
यह भारत वही तो भारत है
जो विश्व गुरु कहलाता था
क्या भूल गए इसके गौरव को
तुम सेनानी याद करो
यह समय है कुछ कर जाने का
इस समय को न बर्बाद करो
(और), ये कदम बराबर चलते जो
इस चाल को न रुकने दूंगा
एक मामूली सा कवि हूं मैं
पर देश को न झुकने दूंगा |
इस देश को न झुकने दूंगा ||
शीर्षक:- नृप
जो राह चलते इस धारा को
उस धरा से जोड़ दे
जो लक्ष्य को भी ला समीप
राह अपनी मोड़ दे
जो शत्रु को लगा गले
गुरूर उसका तोड़ दे
जो दूसरों के वास्ते
समस्त अपना छोड़ दे
वेग जिसका हो अनंत
सूर्य सा प्रकाश हो
कर्म धर्म से जुड़ा
वक्तव्य में विश्वास हो
जो संभाले ये जहां
आशाओं की जो आश हो
हिमशिखा पर जो खड़ा
जो ना किसी का दास हो
जो हितैषी जो समूची
सैन्य का जो गाना हो
जो धारा से हो जुड़ा जो
मान का सम्मान हो
जो अथक हो जो अमोघ
सा अचूक बाण हो
जो सदा ही प्रेरणा हो
प्राणी का जो प्राण हो
जो अकेला ध्रुव तरह
अमर वह जिसकी शान हो
अरे ! खो भले दे वो हृदय
हृदयों में जिसकी जान हो
अक्षरों के इर्द-गिर्द
शब्द के समान हो
नृप उसे ही बोलते
वो बाल्य हो जवान हो ।
शीर्षक:- भारतीय नारी
दिनभर निशा सा बीत गया
पर द्वार खड़ी सब वह सुनती
चली आ रही शूर – वीर सी
शब्दों के धागे बुनती
राज-पाठ के पथ पर अपना
कर त्याग निःस्वार्थ खड़ी
राजमहल क्या कुटिया के भी
द्वंदो के वह दद्वार पड़ी
जाने अब क्यों उसकी छाया
संग में सीना तान खड़ी
यमराज का अब तो फर्ज ही क्या है
वह तो स्वयं ही काल खड़ी
अंत, अनंत चाहे काल हो सबको
अब तो वह कर पार खड़ी
रक्त घाव से भरी हुई थी
अग्नि की अंगार, खडी
माँ काली सी हुँकार भरे
पर्वत वैष्णों के पार खड़ी
शंकर के डमरू पे नाचे
है अम्बे सी बलवान बड़ी
आर्यावर्त की सर्व शिखा पर
अपना सीना तान खड़ी
माँ चंडी का रूप वह पाकर
शत्रु के दरबार खड़ी
अंधकार – अंधियारों में
जाने अब वह किससे डरती
अपनी मृत्यु को गले लगाकर
हँसते-हँसते वह मरती
पूरे जगत पे राज करने की
अब भारत की बारी है
(और) जो चण्डी का रूप धरे है
वही तो भारतीय नारी है।
घरबार उसी में होता है
परिवार उसी में होता है
सबका जो-जो यहाँ जन्म लिया
संसार उसी में होता है
शत्रु, विधन्, बाधाएँ
घेरे बैठी सब उसको जग में
खून नहीं ज्वाला बहती
उसके इस रूप की रग-रग में
ममता से भी भरी हुई
सबका वह मन बहलाती है
दुश्मन काँपे जिससे थर थर
नारी शक्ति कहलाती है
श्रृंगार करे, संघार करे
दुश्मन की सीमा पार करे
काली सा घर रूप चंडाली
माँ गौरी सा प्यार करे
सम दीपक के अंधकार में
जलती वह अग्नि जैसी
बात करे बस विजयी भवः की
नतमस्तक फिर हुई कैसी
भारत देश के चरणों में
झुक्ती यह दुनिया सारी है
जो गौरी का रूप धरे है
वही तो भारतीय नारी है
(और) जो चंडी का रूप धरे है
वही तो भारतीय नारी है ।
शीर्षक:- आज यहाँ
खुशी के आंसू गम के आंसू
आज यह मिलकर बरस रहे हैं
चुपके बैठे कल मैं पल वो
आज ही जिन को तरस रहे हैं
कल की दुनिया में कैसे अब
जाएं ये हमको पता नहीं है
भूले भटके यहां जो पहुंचे
पता गलत या पता सही है,
बीत गई जो छिपी हुई
हम उन्हें किन्हीं यादों में होते
दिन ना कटते अगर पुराने
आज यहां शायद ना होते |
आज यहां पर खड़े जो हम हैं
क्या सच में यह सही हुआ ?
तारे बिछड़े हों इस नाभ से
क्या जग में ये कहीं हुआ ?
कोई छिपा तो कोई सामने
उन पाल की कुछ यादों में
छिपा हुआ भी कहीं है दिल में
और कहीं कुछ वादों में
जिन यादों से निकल चुके हैं
उन यादों में अभी भी होते
दिन ना कटते अगर पुराने
आज यहां शायद ना होते |
बीत गई कुछ यादें वो जो
कहने को तो हुई पुरानी
पर उन यादों की यादों में
छिपी हुई है नई कहानी
लिखी थी एक पन्ने पर मैंने
उन यादों की वही कहानी
उड़कर जाने कहां चली वो
गई सताकर बनी सयानी
अगर छुपा कर रखे होते
तो वे पल ऐसे ना खोते
दिन ना कटते अगर पुराने
आज यहां शायद ना होते |
यह रास्ता बस इतना ही था
जिस पर हम सब संग चले
संग रहे बस एक ही दिन हम
सुबह उगे और शाम ढले
यह साले बस एक ही पल थी
घड़ियां हम ना रोक सके
छोड़के सबको चला गया
उसे समय को ना हम टोक सके
अगर साथ में होते कुछ पल
आज शायद ऐसे ना रोते
दिन ये कट गए सभी पुराने
आज यहां कैसे ना होते |
आज यहां कैसे ना होते ||
शीर्षक:- कश्मीर हूँ मैं
बाधाओं का एक घेरा हूं,
जलता हुआ अंधेरा हूं
पृथ्वी पे स्वर्ग मैं साज हूँ,
सुशोभित हिंद का ताज हूँ
उन हिमगिरियों का डेरा हूँ,
सब धर्मो का मैं बसेरा हूँ
वो अग्नि-वायु-नीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूँ मैं |
फूलों की में एक धारा हूँ,
तरुणों से भरा मैं सारा हूँ
सुंदर सा प्रस्तुत गीत हूँ मैं,
औरों की वो एक मीत हूँ मैं
रोशनी से भरा एक तारा हूँ,
अब तक न कभी मैं हारा हूँ
अमृत से भरा हुआ क्षीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूं मैं ।
मैं मृत्यु की एक लहर हूँ,
शत्रु के पथ पे कहर हूँ
सीमाओं की वो जंग हूँ मैं,
ध्वज का वो केसरी रंग हूँ मैं
शत्रु की पूरी हार हूँ,
सम्मुख उसके ललकार हूँ
एक योद्धा और एक वीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूँ मैं |
वो पूरे देश की आस हूँ,
शत्रु के सबसे पास हूँ
वो खुद में एक उपकार हूँ मैं,
पूरे भारत का सार हूँ मैं
वो देश-विदेश का रस्ता हूँ,
मैं रोता हूँ- में हँस्ता हूँ
एक रंग-बिरंगा चीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूँ मैं ।
~ पार्थ सारथी शुक्ल