हमारी वेबसाइट “Science ka Mahakumbh” में आपका स्वागत है। यहां पर पार्थ सारथी शुक्ल जी की कविता प्रकाशित किया जाएगा। आप सभी इसका आनंद लीजियेगा।
PARTH SARTHI SHUKLA KI KAVITA

शीर्षक:- लंकेश्वर
यह बात रामायण के युद्ध के अंतिम चरण की है,
जब रावण के तीर लगा है और रावण मूर्छित अवस्था में है…
कि, अंत हुआ रामायण का जब भूसाई लंकेश पड़े।
उस ज्ञानी से ज्ञान लेने को समक्ष नाग वो शेष खड़े।।
शेष नाग अर्थात हैं लक्ष्मण जी
तो लक्ष्मण जी रावण से प्रश्न करते हैं कि,
क्यों किया राम से बैर तुमने यह बात जानने आया हूं,
जिस कारण वश तुम हारे हो वो वजह पूछने आया हूं ।
तो रावण इसका उत्तर देते हुए पहले अपना एक सूक्ष्म परिचय देता है और कहता है,
कि, लंका पे करता राज हूं मैं
सब असुरों का सरताज हूं मैं
ब्राह्मण हूं मैं, सर्व शक्तिमान
हूं मैं सर्वज्ञ, हूं मैं महान्
वे बीस भुजाएं लिए हुए
शंकर को अर्पण दिए हुए
दस शीशों की बुद्धि मुझमें
शिव शंभू की सिद्धि मुझमें
मैं वो होनी जो टले नहीं
हूं वो धारा जो जले नहीं
देवादीदेव का केश हूं मैं
हां हां ! वो ही लंकेश हूं मैं।
अब रावण अपने उत्तर को प्रारंभ करता है ~
मरना था राम के हाथ मुझे
न होगा यह सब ज्ञात तुझे,
कि, माता को हर मैं लाया था
पर छू न उन्हें मैं पाया था,
उस पल से मैं घबराया था
हनुमंत ने लंक जलाया था।
मृत्यु का मुझ पर साया था
जब राम से सेतु बनाया था,
अब नष्ट हो गया अहंकार,
जो मुझमें यूं ही समाया था।
परन्तु लक्ष्मण,
राम ने न यह जीत दिलाई
लक्ष्मण ये जीत तुम्हारी है,
वजह अनुज था मेरा बस
जिस कारण लंका हारी है।
वह तनिक न तेरे जैसा है
तभी हाल ये मेरा ऐसा है,
और हार तो मेरी तय ही थी
जब भाई विभीषण जैसा है।
और अंत में रावण कहता है कि,
हो गया सफल जीवन मेरा
ले चलो प्रभु अब साथ मुझे।
क्यों किया राम से बैर मैने
हो गया न लक्ष्मण ज्ञात तुझे।।
हो गया न लक्ष्मण ज्ञात तुझे।।
शीर्षक:- कुरुक्षेत्र (रण के पूर्व)
है शत्रु जाने क्यों तत्पर
अस्त्र शस्त्रों की नोकों पे
न जाने क्यों यूं चाहता वो
रंगना शोणित के झोंको से
एक हुआ उदय वह सूर्य जिससे
एक नया युद्ध आरंभ हुआ
दोनों पक्ष विपरीत दिशा में
कुरुक्षेत्र प्रारंभ हुआ
एक से एक थे वीर धनुर्धर
और अजय महारथी भी थे
अर्जुन को पथ बुलाने वाले
सखा कृष्णा सारथी भी थे
समक्ष हजारों की सेना के
पांच भाई थे खड़े हुए
केशव उनके पक्ष में जो की
उन पांचो संग अड़े हुए
यह युद्ध की जैसे सपना था
वहां कौन पराया अपना था
लड़ने को यूं सब आतुर थे
जय जय कारा बस जपना था
यह जान की भी है युद्ध समक्ष
ब्रह्मांड में सबसे गहरा है
ठहरते दोषी काल को सब
पर काल तनिक न बेहरा है
रोमांच भरे हर एक योद्धा
नेत्रों में लेकर ज्वाल खड़ा
जाने कैसा था वह मंजर
जब सुनसान चौपाल पड़ा
गूंजे अंबर में शंकर असंख्य
शौर्यों को जिसने दर्शाया
उसे गन से दोनों पक्षों ने
न पाकर भी कुछ-कुछ पाया
झलकी की उसे गंज से दहशत यूं
जैसे शोणित की धारा हो
मानो की लगता कालचक्र में
कोई कभी ना हारा हो
यह कहां शुरू और कहां खत्म
यह रण अपने में अनंत था
और काल मनुज का घूम रहा
करने को सबका अंत था
अभी युद्ध नहीं प्रारंभ हुआ
ना जीते ना कोई हारे थे
अंबर में गूंजे एक ध्वनि
लगते वहां जय जयकार थे
विष्णु की जय ब्रह्मा की जय
महाकाल कल निर्माता की
नक्षत्र की देव ब्रह्मांड की जय
जय मनुज दनुज निर्माता की
इस रण की जय कण कण की जय
जय हो सायं और प्रातः की
जंजाल की जय चौपाल की जय
जय जय उस भाग्य विधाता की ||
शीर्षक:- कुरुक्षेत्र (रण)
शौर्य का वरदान का
वो दीन का वो दान का
वो मृत्यु का वो जान का
शोणित का वो है शान का
ये रन प्रतीक है मान का
अनन्य स्वाभिमान का
बाणों की वो बौछार मची
सब जन में हाहाका मची
यहां रण ऐसा विकराल हुआ
वो विजय-पराजय-हार मची
रखने शोणित का मान सभी
तत्पर देने को जान सभी
सब आंख मूंद कर वार करें
मानो लगता अंजान सभी
सब जल धारा से टूट पड़े
विस्फोट हुआ अब फूट पड़े
मृत्यु से सब वहां झूल रहे
मानो यमलोक से छूट पड़े
नरमुंड-झुंड बिखरे हुए
वितुण्ड-शुंड बिखरे हुए
वो अंग-भंग बिखरे हुए
रक्तों के कुंड बिखरे हुए
था धूल के हर कण कण में रन
वो रण हर एक के साया में
वो रण हर एक के रग में भी
वो रण था काल की छाया में
हर इक युद्ध था मौन खड़ा
म्याने वो बोल रहीं बोली
यह रण क्या मानो जैसे कि
तलवारें खेल रही होली
सब राह ताकें बस सूरज की
कब ढलने को यह जाएगा
पाञ्चजन्य कब बजेगा, और
कब युद्ध यहीं थम जाएगा।।
शीर्षक:- सनातन धर्म
वैसे तो कहने को हम सब
सीधे-साधे कहलाते हैं
कट्टरता के नाम पर तो बस
भगवा ही लहराते हैं
अरे, समय तो आने दो तुम सब
हम तुमको भी बतलाएंगे
हम उसी सनातन धर्म के हैं
जो पत्थर भी तैरते हैं
धर्म है यह उसे शंकर का
जो विष पीके ना थमता है
आजमा लो कैलाश की ऊंचाई
क्या तुम्ह में इतनी क्षमता है
और तुमको लगता हम पिछड़े
उर्दू फारसी तुम झाड़ गए
अंदर ही अंदर डरते थे
क्यों तक्षशिला उजाड़ गए
यहां हुआ एक वह कृष्णा जिसने
जीवन जीने का सार दिया
एक राम भी था वह त्रेता का
जिसने सेतु निर्माण किया
और, यह धर्म सनातन वीरों का
तुम जैसे ना यहां जन्म लिए
और तुम ठहरे अभागे
तुमने थे जो वो दुष्कर्म किया
अरे दुनिया की तुम बात करते
बोलते दुनिया हमारी है
इतिहास में जाकर झांको तो
प्रचंड सनातनी सारी है
अरे जाओ यहां से अब तुम सब
तुम्हारा यहां कोई काम नहीं
और तुम भी जान लो अब कोई
सनातन से बलवान नहीं ||
शीर्षक:- कु पथ से पथ
शांत सा यूं बैठा क्यों मनुज तू राह छोड़ कर
चला गया तू पथ से क्यों कु पथ को शीश मोड़कर
तू उठ सही औ’ चल जरा सीमाओं को यूं तोड़ कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर |
शत्रु की ये राह जहां खड़ा तू सीना तान के
लौट आ तू पथ पे अपने अपनी पूरी शान से
क्यों जान कर अंजान कर रहा तू पथ को छोड़ कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर |
यह काल चक्र है विषम इस काल को तू जानकर
बाधाएं जो विरोध में शत्रु उन्हें तू मान कर
मनुज तू अंत काल का विषम समय को छोड़कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर |
असीम शक्ति तुझमें जो उस शक्ति से तू वार कर
वो शत्रु, बैरी और काल पे सदा प्रहार कर
जख्म से बहे जो उस लहू की धारा मोड़कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर ||
शीर्षक:- छात्रावास
कि छात्रावास एक परिवार है,
माता-पिता के समान मित्रों के द्वारा दिया गया प्यार है
एक छोटा सा संसार है छात्रावास
अपनों की जीत के लिए हार है छात्रावास
संग खान संग सोना संग नहाना है छात्रावास
छुट्टी के दो दिन पहले घर जाने का बहाना है छात्रावास
रूठे को मानना है छात्रावास
झूठी सच्ची बातें बनाना है छात्रावास
रात को देर तक जागना है छात्रावास
वह बीच कक्षा से भागना है छात्रावास
वह एक दूजे का वास्ता है छात्रावास
हर मुसीबत से निकलने का रास्ता है छात्रावास
हां छात्रावास को खुशी की मिसाल है
चमकती दमकती जो पूरे साल है |
तो यह है मेरी नजरिया का छात्रावास, क्या आप समझे कि छात्रावास क्या है?
यदि नहीं! तो चलिए चलते हैं अपनी इस अनोखी यात्रा को जारी रखते हैं –
यह यात्रा है छात्रावास की
मेरे मन के आसपास की
छात्रावास एक अनोखी याद है
बिन जिसके सब कुछ बर्बाद है
यह आवास नहीं है घर है
जीवन की अहम डगर है
क्या दिन है और क्या रात है
कैसे मैं कहूं क्या बात है
वह खुशी का पाल है छात्रावास
एकता का बाल है छात्रावास
वह झुंड कक्षा का छात्रावास
बंधन रक्षा का छात्रावास
हां छात्रावास को खुशी की मिसाल है
चमकती दमकती जो पूरे साल है |
और,
जिंदगी का पल जो सबसे खास है
वही तो इस यात्रा का छात्रावास है ||
शीर्षक:- तू – एक प्रहार
खड़ा रहे डटा वही
जहां, शत्रु की बाहर हो
वो जल का हो, वो थल का हो
वो वायु का प्रहार हो
जिगर हो तुझ में वैसा
जैसे सिंह की दहाड़ हो
हो चौड़ा सीना तेरा
जैसे हिमगिरी पहाड़ हो
दक्षिण में तू खड़ा रहे
सागर जैसे विशाल हो
तू कर सके तू कर वही
दुश्मन का बुरा हाल हो
तू कर प्रहार जैसे तू
अचूक अमोघ बाण हो
शत्रु का शीश हाथ में
विजयी का वो प्रमाण हो
वो जीत हो बस जीते हो
तनिक न तुझमें हार हो
तू कर चढ़ाई वैसे, जैसे
परशु का तू वार हो
वो मृत्यु – जीव मे हो तू
गीता का तुझमें सार हो
तू बढ़ अकेला जैसे, पूरे
देश का वो भार हो
है आदि तू अनंत तू
वह शेष की फुफकार हो
चमक उठे किरण से जो
शिवा की वो तलवार हो
हर कदम पर तेरे सभी
शत्रु का संहार हो
तू खुद ही एक प्रहार हो |
तू खुद ही एक प्रहार हो ||
~ पार्थ सारथी शुक्ल