शोणित धार
By- VARUN SINGH GAUTAM दिन – दिन बितते तिरते – तिरते तिमिर कोकोई आमद तो कोई होता निर्वाणजीवन क्षणभङ्गुर – सी न रहता तन कोफिर भी होता हीन क्यों मानव इस फण के ? तम भी ढ़ुलकती आती भोर – विभोर के खगरवि भी क्षितिज प्रतीची से लौटती आती नभ कोजग करती हुँकार नतशिर सदा …







