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ABHIJEET CHATURVEDI KI KAVITA

शीर्षक:- ईशतृष्णा
क्या त्रेता में पाप नहीं था ?
क्या द्वापर न दुखदाई था ?
क्या कलयुग में धर्म नहीं है ?
क्या सतयुग न सौदाई था ?
हर युग में अवतरित हुए तुम केशव,
क्या कहते हो कालजई हो ?
किया संहार पाप या पापी का ?
तुम कहते हो मायाविजयी हो ?
तुम्हीं कहते हर कण में तुम हो,
क्या पापों में तुम्हारा अधिकार नहीं।
धर्म करे बैकुंठ मिले सोही,
ये पापी क्यों तुम्हे स्वीकार नहीं ?
हे कमलनयन हे कमलकांत,
हे युगपुरुष हे दीनानाथ।
तुम्हीं कर्ता हो तुम्हीं भर्ता,
जीवों से पाप कराते तुम।
क्या है ये आने का तुम्हारा रस्ता,
ये धर्म का मार्ग है कठिन बड़ा,
मुझको इक अधम बना दो तुम।
ये नैन तरसे तुमरे दर्शन को,
करो संहार मगर दिखला दो तुम।
किंतु इतना याद रहे हे छलिया,
मूल स्वरूप दिखलाना तुम।
कभी राम कृष्ण, बामन बने,
तुम हो क्या ये बतलाना तुम।
क्या होती नीति धर्म की युग युग में,
अर्जुन जैसे बतलाना तुम।
क्या सांस लेना कुछ पाप रहा ?
क्या जीव संहार भी धर्म में है ?
फलों का लालच मिटवाते हो,
कहते हो सबका मूल तो कर्म में है।
यदि कर्म हमारे पावन हैं,
तो संघर्षों को क्यों दिखलाते हो ?
पापमुक्त हो जाए कोई,
फिर क्यों माया में बहलाते हो ?
हो योग पुरुष, हो छलिया हो,
ये योगीराज तुम कलिया हो।
क्यों संसार घुमाते रहते ?
सुदर्शन किसे दिखाते रहते ?
क्या है ये संसार शस्त्र तुम्हारा,
जहां विलीन है जीवनराज सकल,
कही धर्म फूलता कहीं अधर्म,
कहीं काम फूलता और कल बल छल।
क्या यही तुम्हारा सार नहीं ?
क्या यही मूल संसार नहीं ?
कितने जगहों पर प्रकट हुए ?
हे नरसिंह किस किस कण में हो ?
रक्षा संहार करते प्राणों की,
हे नारायण किस जीवन में हो।
ये घटना चक्र चलाया करते,
स्वयं हर दुर्योधन पैदा करते।
उनका अस्तित्व बोध भी किनसे हो,
तुम खुद को कण कण में बसाया करते।
तुम स्वामी हो जग के कारक,
ये बतलाओ अब कब आओगे ?
हो प्रकट कल्कि या हो चतुर्भुज,
अपना दरस कब दिखलाओगे ?
तुम कब इस दास के गले लगोगे?
तुम कब दुष्टों का संहार करोगे ?
एक जीव में सम्मिलित पाप पुण्य,
तुम धर्मागत कैसे कर पाओगे ?
हे बालमुकुंद हे महाकाल,
हे जगन्नाथ तुम कब आओगे ?
इतनी सी अर्जी सुन लो तुम,
हल्की संकेत बता देना,
न किया धर्म मैं फिर भी।
इक झलक इस अधम को दिखला देना।
न होऊं पावन न मिले बैकुंठ,
अति घोर नरक दिखला देना।
किंतु हे माधव पुकार सुनो
बस एक झलक दिखला देना।
बस एक झलक दिखला देना।
शीर्षक:- शस्त्राग्रह
जीवन में जो ये गिराव है,
भावनाओं का भराव है;
नेतृत्व का चुनाव है, प्रगति को प्रेषित घाव है।
ये संघर्ष बीत जाएगा, मनोकर्म रीत जायेगा; योग्यता दिलाएगा, निराशा को मिटाएगा।
करुण हृदय की वेदना,
तनिक न दिल में घाव कर;
मनो विनोद त्याग कर, तू सत्य का चुनाव कर।
चिंगारियां जलेंगी जब,
शमर विलोप जायेगा;
आंधियां उठेंगी तब,
चिराग गीत गाएगा।
मशाल जो जला रहा,
मिसाल सा बन जाएगा;
नवीन युग जो आयेगा,
संतुष्टि को मिलाएगा।
श्याम मेघ छाएंगे,
बिन भाद्र मेघ आयेंगे;
नियति न तू रहेगी तब,
वो दौर लहलहाएंगे।
हे वीर न विचार कर,
नित कर्म कर प्रहार कर;
शमर पटे, पाप, लाशों से, तू अग्नि से श्रृंगार कर।
योद्धा तू हार न मूक बन,
वनवास को स्वीकार कर;
रत रहे तू कर्म में निरत,
नियति का तू संहार कर।
माना कि युग अनुकूल नहीं,
अनुनय में बरसे फूल नहीं;
बस अंगारों का शोला है, तो इक योद्धा ने अब बोला है।
संग्राम शमर का शोला है,
हाथों में बस्ता झोला है;
ये बारूदों का खोला है, अब एक चिंगारी बाकी है।
जद में अब आती खाकी है,
ये रक्तवर्ण ये लहू नहीं;
ये जवां जबां बेबाकी है।
ये शब्द छूटते बाणों से, शासन की ताका झांकी है;
वो थी अगस्त की चली गई,
अब शीत क्रांति भी आएगी;
जब कलम कटारी बन जाएगी, जब कलम कटारी बन जाएगी।
अभिजीत चतुर्वेदी की कलम से
शीर्षक:- संगृहीत प्रेयसी
माना कि प्रेम ये विह्वल है
अश्रु धार सी निर्मल है।
अब रीत प्रिय की लागी है,
वरना ये भी वैरागी है
ये रहता कहीं पहाड़ों में,
कंदराओं में अखाड़ों में।
अब किया प्रेम तो भुगतुंगा,
रम प्रिय प्रेम में जुगतुंगा।
हृदय पावन क्यों खोता है,
अब अश्रुबिंद भी रोता है।
ये प्रेम नहीं प्रत्याशा है,
जीवन ज्वलंत की आशा है।
शंभू भी अश्रु में जले गए,
राम कृष्ण भी छले गए।
है कौन ! कहे जो ये माया है,
न इसकी कोई काया है,
रहे नित निरंतर पुलकित ये,
अहोभाग्य प्रेम जो पाया है।
कई मिटे कल्प विषादों में,
रत रहे प्रियतम की यादों में।
प्रीत प्रेम चिनगारी है,
ये प्यासी एक बीमारी है।
ये सती मातु की रीता है,
हो प्रखर तो अनल पुनीता है।
वैराग्य प्रेम अवनीता है,
शंभू को इसने जीता है।